top of page
  • Shubha Khadke

आशा किसान स्वराज सम्मलेन २०२२

अलायन्स फॉर सस्टेनेबल एंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर (ASHA) -किसान स्वराज नेटवर्क द्वारा एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमे भारत के विभिन्न राज्यों से आये १९०० से ज्यादा किसानों, सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि, संशोधक एवं शैक्षणिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिसका उद्देश्य भोजन, किसान और स्वतंत्रता को केंद्र में रखकर लोगों को जागरूक करना था।


"जल, जंगल, बीज और जमीन, सब हो किसानों के आधीन"
लाभ से समृद्धि की ओर - सजीव / जैविक खेती
छोटे किसानो के हित में हो सरकारी नीतियाँ….

इन्ही सारे मुद्दों के साथ पांचवा आशा किसान स्वराज सम्मलेन ११ से १३ नवम्बर को मैसूर में संपन्न हुआ।

विविधता, रंग, उत्साह और सबको बांधने वाला अपनापन ही आशा किसान स्वराज सम्मलेन २०२२ का वैशिष्ट्य


था। इसे किसानो का सबसे बड़ा उत्सव कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा। अलायन्स फॉर सस्टेनेबल एंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर (ASHA) यानि सतत और समग्र कृषि के लिए गठबंधन या आशा-किसान स्वराज नेटवर्क द्वारा आयोजित इस सम्मलेन में भारत के विभिन्न राज्यों से आये १९०० से ज्यादा किसानों, सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि, संशोधक एवं शैक्षणिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।


सम्मलेन की पृष्टभूमि

आशा-किसान स्वराज गठबंधन संगठनों और व्यक्तियों का एक अनौपचारिक नेटवर्क है, ये स्वयं सेवकों द्वारा संचालित है जो 2010 में किसान स्वराज यात्रा आयोजित करने के लिए एक साथ आए थे, यात्रा का उद्देश्य देश से संबंधित मुद्दों मुख्यतः भोजन, किसान और स्वतंत्रता को केंद्र में रखकर लोगों को जागरूक करना था। नेटवर्क में किसान संगठन, उपभोक्ता समूह, महिला संगठन, पर्यावरण संगठन, व्यक्तिगत नागरिक और विशेषज्ञ शामिल हैं जो ग्रामीण भारत में स्थायी कृषि आजीविका के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिसमें यह सुनिश्चित करना शामिल है कि उत्पादक संसाधन कृषक समुदायों के नियंत्रण में हैं और इस प्रकार, सभी भारतीयों के लिए सुरक्षित, पौष्टिक, विविध और पर्याप्त भोजन उपलब्ध है।


किसान स्वराज यात्रा और उसके बाद के कार्यों के दौरान उभरे संवादों से, आशा ने 4-स्तंभ वाली किसान स्वराज नीति को स्पष्ट किया। किसान स्वराज नीति के चार स्तंभ हैं (1) किसान परिवारों के लिए आय सुरक्षा; (2) कृषि की पारिस्थितिक स्थिरता; (3) भूमि, जल और बीज जैसे कृषि संसाधनों पर लोगों का नियंत्रण; और (4) सभी के लिए सुरक्षित, स्वस्थ, पौष्टिक और पर्याप्त भोजन तक पहुंच।


आशा किसान स्वराज सम्मलेन 2022


तीन दिवसीय सम्मलेन में मुख्य और समानांतर दोनों तरह के सत्र हुए। बीज विविधता, जैव विविधता, जैविक भोजन, किसान और उनसे जुड़े मुद्दों पर चर्चा, सार्वजनिक व्याख्यान, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं नवाचारी किसानो के साथ संवाद के साथ ही ये सम्मलेन संपन्न हुआ। तीन दिन सम्मलेन के बाद मैसूर के आस पास के नवाचारी किसान और उत्पादक संघ में क्षेत्र भ्रमण भी किये गए।


सम्मलेन का उद्घाटन केरल के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री प्रसाद ने किया। मैसूर एक ऐसा शहर है जो अनुवांशिक संशोधनों (जेनेटिकली मॉडिफाइड)से तैयार किये बीजों से मुक्त है ऐसे में इस स्थान पर किसान स्वराज सम्मलेन का आयोजन बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। उद्घाटन कार्यक्रम में मंच कई गणमान्य व्यक्तियों ने साँझा किया और खेती में विविधता के बारे में चर्चा की।खेती की परंपरागत पद्धतियों को फिर से अपनाने के साथ मिट्टी को मरने से बचाने, बीज और जैव विविधता को अपनाने एवं रासायनिक खाद पर सब्सिडी को पूर्णतया बंद करने पर जोर दिया गया। स्पष्ट किया गया कि छोटे किसानों को अपना जोखिम कम करने के लिए साथ आना होगा जिससे बाजार तक उनकी पहुंच बढे। स्थानीय उत्पादों / संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिले। जलवायु में हो रहे परिवर्तनों को भी गंभीरता से लेने की जरुरत है। संक्षेप में बढ़ती जनसँख्या की भोजन आपूर्ति के लिए वातावरण को समझकर किसानों को सहयोग प्रदान करने होंगे। इन्ही सारे विषयों पर चर्चा हुई।


इन विषयों पर आशा द्वारा किये गए प्रयासों का भी जिक्र किया गया। स्थायी जैविक खेती और देशी बीजों के संरक्षण और संवर्धन के लिए सतत कार्य करने वाले भारत के पारिस्थितिक खेती आंदोलन के अग्रदूतों को श्रद्धांजलि भी दी गई।


उद्घाटन कार्यक्रम के बाद सामानांतर सत्र शुरू हुए। ये मुख्यतः अंग्रेजी, हिंदी और कन्नड़ में रखे गए थे जिस से भाषा की सुविधा का ध्यान रखते हुए सभी के द्वारा इन कार्यक्रमों का लाभ लिया जा सके।

अन्य आकर्षण


कार्यक्रम के उद्घाटन के साथ ही बीज विविधता महोत्सव भी शुरू हुआ जिसमे १८ राज्यों के लगभग १०० बीज संरक्षकों ने २००० से ज्यादा विभिन्न फसलों की किस्मों को प्रदर्शित किया। जड़ और कंद उत्सव में विभिन्न प्रकार के कंदों रखा गया था जिस से इन के बारे में स्पष्टता मिल सके।

इसके साथ ही शहरी बागवानी कार्यशाला, सूती धागे की कताई और प्राकृतिक रंगाई सम्बन्धी कार्यशाला, मिट्टी के बर्तन, हस्तनिर्मित साबुन बनाने की कार्यशाला भी आयोजित की गई। तीनों दिन सांस्कृतिक कार्य क्रम रखे गए थे जिस में केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के पारम्परिक नृत्य एवं नाटक को देखने का अवसर


मिला। सम्मलेन में भारत के जाने माने जैविक और नवाचार करने वाले लगभग २० किसानों से सीधे संवाद का भी अवसर था। उनका मार्गदर्शन और खेती में आ रही चुनौतियों से वे कैसे सामना कर रहे है इस पर चर्चा निश्चित ही प्रेरणादायी रही।




सम्मलेन का एक आकर्षण जैविक भोजन भी रहा। विभिन्न राज्यों के स्वसहायता समूहों और जैविक कृषकों ने भोजन के स्टॉल लगाए थे जिसमे रुचिकर पारम्परिक खाद्य पदार्थ थे।


सत्रवार विवरण


उद्घाटन के बाद सामानांतर सत्र शुरू हुए। सम्मलेन में कुल १९ सामानांतर सत्र चले और उपस्थित प्रतिभागियों ने अपनी रूचि के अनुसार इन सत्रों में भाग लिया।

सामानांतर सत्र इस प्रकार से थे -

१. कृषि में जलवायु परिवर्तन से निपटना

2. पारंपरिक किस्मों का पुनरुद्धार - संरक्षण, गुणन, खेती और उपभोक्ता मांग - औपचारिक बीज प्रणालियों और नए संस्थागत मॉडल में एकीकरण

3. मृदा स्वास्थ्य और पौध पोषण और पौध संरक्षण सहित पारिस्थितिक अभ्यास। सिंथेटिक रसायनों के बिना "खरपतवार" प्रबंधन 4. किसानों का बाजार 5. किसान सामूहिकता (सरकार की 10k एफपीओ योजना में जैविक/प्राकृतिक खेती एफपीओ और सहकारी/समूह खेती के अनुभव शामिल हैं) 6. जैविक/प्राकृतिक उत्पाद का विपणन (प्रसंस्करण/मूल्यवर्धन आदि और विविध संस्थागत विकल्प सहित) 7. उपयुक्त प्रौद्योगिकियां (उत्पादन और उत्पादन के बाद दोनों) 8. व्यापक पशुधन प्रणाली 9. भारतीय किसानों के बीज अधिकार-खतरे और भविष्य के कदम 10. व्यापार न्याय (डब्ल्यूटीओ और एफटीए को कवर करते हुए) 11. कृषि-डिजिटलीकरण 12. फूड फोर्टिफिकेशन 13. जीन टेक्नोलॉजीज, सहित जीनोम संपादन 14. मानव-पशु संघर्ष - क्या कोई लाभकारी समाधान हैं? 15. महिला किसान 16. काश्तकार किसान 17. आदिवासी किसान 18. कृषि श्रमिक 19. जैविक और प्राकृतिक खाद्य/उत्पाद प्रमाणन

प्रथम दिवस में सामानांतर सत्र के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। इस के बाद पद्मश्री भारत भूषण त्यागी और पद्मश्री साबरमती जी एवं श्री प्रकाश भट्ट ने भारत में कृषि में आ रही वर्त्तमान समस्यों और संभावित उपायों और किसानों के लिए नीति नियमों में किये जाने वाले सुधारों के बारे में बात की। उन्होंने बताया कि वर्त्तमान में कृषि में विरोध नहीं संवाद की जरुरत है। प्रकृति की व्यवस्था को समझना ही सजीव खेती है। अनुसन्धान और नीतियां प्रकृति की व्यवस्था के अनुरूप होनी चाहिए। राष्ट्रीय नीति के साथ राज्य सरकार की क्रियान्वयन की नीति भी समेकित कृषि कार्य योजना की होनी चाहिए। खेती के बाज़ारीकरण के बजाय लाभ से समृद्धि की ओर अग्रसर होना चाहिए।


दूसरा दिन; भारत में एग्रो इकोलॉजी को बढ़ाने में किये गए प्रयासों और उनसे मिली सीखो के साथ शुरू हुआ। इसमें आंध्रप्रदेश के विशेष मुख्य सचिव श्री विजय कुमार, कर्नाटक की कृषि निदेशक श्रीमती नंदिनी कुमार, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के सलाहकार श्री प्रदीप शर्मा, हिमाचल के श्री परमार एवं केरल की श्रीमती लिसिमोल ने अपने अपने राज्यों में सरकार के सहयोग से एग्रो इकोलॉजी में किये गए कार्यों का विस्तार से वर्णन किया। इसमें वासन के श्री रविंद्र ने स्वैच्छिक संस्थाओं के अनुभवों को साँझा किया। इस सामूहिक सत्र के बाद सामानांतर सत्र हुए। सांध्यकालीन सत्र का विशेष आकर्षण श्री देविन्द्र शर्मा एवं श्रीमती नंदिनी जयराम का व्याख्यान रहा। उन्होंने कृषि करने वाले परिवारों के आर्थिक सुरक्षा के बारे में चर्चा की। इसके बाद भारत बीज स्वराज मंच ने वाविलोव एवं रिचारिआ अवार्ड दो बीज संरक्षक किसानों को प्रदान किया।


तीसरा और अंतिम दिन जानकारियों से भरा हुआ था. प्रथम प्लेनरी सत्र "सीमांत और हाशिये के किसानों को सशक्त बनाना" पर था। इसमें देश के कोने कोने से आये किसान प्रतिनिधियों, किसानों के साथ और उनके लिए काम करने वाले कार्यकर्ता और विशेषज्ञ ने अपने विचार व्यक्त किये। महाराष्ट्र से आई दलित किसान द्वारिका ताई ने बहुत ही बेबाकी से महिला किसान अधिकार मंच (MAKAAM) द्वारा किये जा रहे कार्यों पर बात की।

इस सत्र में महिला किसान, किराये से जमीन लेकर खेती करने वाले किसान, आदिवासी किसान आदि की चुनौतियों के बारे में चर्चा की गई। भारत में कई सारे प्रगतिशील कानून है जो किसानों के हित में भी है परन्तु उनका कार्यान्वयन एक बड़ी समस्या है। खेती में ७०% काम महिलाये करतीं है फिर भी महिला को किसान के

रूप में मान्यता नहीं मिलती। जमीन सम्बन्धी किसी भी दस्तावेज पर उनका नाम नहीं होता। अतः उनकी जागरूकता, प्रशिक्षण और क्षमता वर्धन पर काम किया जाना चाहिए। बड़ी जमीन और सिंचाई के साधन अक्सर बड़े किसानों के पास होते है ऐसे में छोटे और सीमांत किसानों को ज्यादा पैसा देकर पानी का प्रबंध करना पड़ता है। उनकी उपज का दाम कम मिलता है और उनको बाजार से महँगी वस्तुएं खरीदनी पड़ती है। किराये पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसानो की समस्या अधिक है क्योकि अधिकतर योजनाओ का लाभ उनको ही


मिलता है जिनके नाम जमीन होती है। ऐसे किसानो की पहुंच ऋण देने वाली संस्थाओं तक भी नहीं होती। छोटे किसान अक्सर खेती के लिए ऋण लेते है परन्तु उनकी उपज को बाजार में बेचते समय उनके पास सौदेबाजी का अवसर नहीं होता। बाजार द्वारा तय कीमत या कई बार उस से कम कीमत पर भी उनको अपनी उपज बेचनी पड़ती है। समाज सरकार और बाजार यदि मिलकर किसानो के हित के बारे में सोचे तो ये चित्र बदल सकते है।


सामानांतर सत्र में युवा और खेती इस विषय पर युवा किसानो ने अपना पक्ष रखा। आज भी किसानो को या खेती को उत्तम व्यवसाय के रूप में नहीं देखा जाता जिसकी वजह से युवा खेती करने के लिए हिचकते है। समाज की सोच को बदलना, मानसिकता में बदलाव बहुत ही जरुरी है।


समापन सत्र का मुख्य फोकस जलवायु परिवर्तन में खेती की भूमिका और उसमे किये जाने वाले बदलाव पर था। जमीन और प्रकृति के साथ मानव का जो गहरा रिश्ता था वो धीरे धीरे धीरे ख़तम हो रहा है और इसलिए ही समस्या बढ़ रही है। प्राचीन समय में लोग प्रकृति को ध्यान में रखकर कार्य करते थे, जमीन को सिर्फ आय का जरिया नहीं मानते थे बल्कि धरती माँ के रूप में पूजते थे। इसलिए ही पर्यावरण का ध्यान भी रखते थे। हमें पुनः उसी और लौटना होगा। हमारी परम्परागत कृषि पद्धतियों और ज्ञान को जो एग्रो इकोलॉजी पर आधारित था फिर से अमल में लाना होगा। निचले स्तर तक स्थानीयकरण को बढ़ावा देना होगा। गांव में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और उत्पादों के उपयोग को बढ़ाना होगा। जब तक केंद्र सरकार, राज्य सरकार, युवा और हर व्यक्ति जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर एकमत होकर काम नहीं करेंगे तब तक इस समस्या का समाधान नहीं हो पायेगा।


सामानांतर सत्र -


हालाँकि सभी सामानांतर सत्र बहुत ही दिलचस्प थे परन्तु सभी को सुनना संभव नहीं था। ऐसे में कुछ सत्रों में भाग लिया। प्रथम सत्र किसान सामूहिकता/ किसान उत्पादक संघ के बारे में था। पुरुषों का ध्यान केश क्रॉप पर ज्यादा होता है वही महिलाएं खाद्य सुरक्षा, मोटा अनाज या मिलेटस, देशी बीज आदि के संवर्धन में विशेष रूचि रखती है। ऐसे में उनकी आवाज को महत्त्व देते हुए उनके उत्पादक संघों के निर्माण की आवश्यकता है। सत्र में वर्धा और यवतमाळ में मिशन समृद्धि से लेकर आर्गेनिक फार्मिंग एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया तक के बारे में विस्तार से चर्चा हुई। सत्र के सहजकर्ता प्रोफसर शंबुप्रसाद ने कोपरेटिव और उत्पादक संघों में अंतर बताया और जोर दिया कि संघों में छोटे और सीमांत किसानो की भागीदारी कम है। सभी को साथ में लेकर जो सामाजिक प्रक्रियाएं होना चाहिए वो नहीं हो पा रही है इसकी मुख्य वजह एफपीसी (Farmers Producer Company) के

पंजीयन का टारगेट पूरा करना है। वर्त्तमान में २२००० से ज्यादा रेपंजीकृत एफपीसी है जो ज्यादा तर इनपुट प्रदान करने का काम ही कर रहे है। कार्यशील पूंजी का अभाव भी एक समस्या है। बिज़नेस प्लान्स भी नहीं बनाये गए है, ऐसे में सिर्फ उपज के एकत्रीकरण से समस्या का समाधान नहीं होगा। बाजार की व्यवस्था को समझना और स्थायी सतत प्रक्रिया में विस्तार करने की जरुरत है।


इस के बाद जैविक उत्पादों की मार्केटिंग सम्बन्धी सत्र था. इस सत्र में स्पष्ट किया गया कि जो कुछ भी प्रकृति के विरूद्ध है वो जैविक नहीं है. वर्त्तमान में भारत में केवल १% ही आर्गेनिक बाजार है जिसे बढ़ाने की आवश्यकता है। महिला किसान और उनसे जुड़े मुद्दों एवं मकाम (महिला किसान अधिकार मंच) द्वारा किये जा रहे कार्यो पर महिला किसान सत्र में चर्चा हुई। "मृदा

स्वास्थ्य और पौध पोषण और पौध संरक्षण सहित पारिस्थितिक अभ्यास" इस सत्र में सिंथेटिक रसायनों के बिना "खरपतवार" प्रबंधन पर बात की गई। मिट्टी की उर्वरकता को बढ़ाने, सूक्ष्म पोषक तत्व की मात्रा बढ़ाने, उपलब्ध संसाधनों में जैविक उर्वरक बनाने आदि को विस्तार से समझाया गया।


सारांश


तीन दिनों में खेती से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हुई। ये स्पष्ट हुआ कि प्रकृति को संरक्षित करने के लिए प्रशिक्षण देने होंगे। लोगो की जागरूकता बढ़ानी होगी। खेती की विभिन्न पद्धतियों को एक प्लेटफॉर्म पर लाना होगा जहाँ


समन्वित कृषि की बात हो।खेती में परस्पर सहयोगी फसलों का चुनाव हो, मिट्टी और पानी उपलब्धता के आधार पर मल्टीलेयर क्रॉपिंग सिस्टम बनाये जाये। मोनो क्रॉप या एकल फसल पद्धति को रोकना चाहिए जब तक जैव विविधता को नहीं बढ़ाएंगे तब तक समग्र पर्यावरण का विकास नहीं होगा। क्योकि जब फसलों में विविधता होगी तो मिट्टी को पोषण मिलेगा और उत्पादन भी बढ़ेगा। सरकारी नीतियां छोटे और सीमांत किसानो के हित में हो। अनुदान भी जैविक खाद, देशी बीजों के संवर्धन करने वालो को मिले तो सजीव खेती की दिशा में हम आगे बढ़ पाएंगे। यहाँ सम्मिलित प्रयासों की नितांत आवश्यकता है। कुल मिलकर कहा जा सकता है कि जो लोग खेती में रूचि रखते है उनके लिए आशा किसान स्वराज सम्मलेन में भाग लेना निश्चित ही लाभकारी रहा। देश भर से मतलब लद्दाख से तमिलनाडु तक के सजीव खेती करने वाले किसानों से मुलाकात, उनके अनुभवों को सुनना, कृषि विशेषज्ञों का मार्गदर्शन, भारत की जैव विविधता का तीन दिनों में अनुभव करना और जैविक भोजन का रसास्वादन करना वाकई अलौकिक रहा।


 

शुभा खड़के लिविंग फार्म इनकम प्रोजेक्ट, इरमा (IRMA) में प्रोग्राम और आउटरीच कन्सल्टन्ट हैं।





90 views0 comments
bottom of page